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Thursday, February 22, 2024

रामचरितमानस पर राजनीति

रामचरितमानस पर समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य स्वामी प्रसाद मौर्या के बयान पर विवाद उत्तर प्रदेश की विधान सभा तक पहुंच गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रामचरितमानस विवाद पर अक्रामकरुख अपनाते हुए कहा, सपा इस पवित्र ग्रंथ को जलाकर देश और दुनिया में रहने वाले करोड़ हिंदुओं को अपमानित करने का काम कर रही है। जाती विशेष पर केंद्रित ये विवाद अब पूर्ण रूप से एक राजनीतिक मुद्दा बनता दिख रहा है। ज्ञात हो कि सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कुछ समय पूर्व ही श्री रामचरितमानस की एक चौपाई को दलित और महिला विरोधी बताया था और इस पर पाबंदी लगाने की मांग की थी। प्रदेश में इस बयान के समर्थन में ओबीसी समूह के कुछ लोगों ने जगह-जगह पर धार्मिक ग्रन्थ की प्रतियां जलाई। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की पुरे मामले पर चुप्पी, पार्टी के इस मुद्दे को आगामी आम चुनाव में भुनाने की एक कोशिश की तरह देख जा रहा है।

रामचरितमानस विवाद के पीछे की राजनीति

2024 में आम चुनाव होने है और सरकार बनाने में उत्तर प्रदेश राज्य की अहमियत सभी दलों को है। ऐसे में स्वामी प्रसाद मौर्या के बयान को जातिगत राजनीति से जोड़ कर देखा जाना स्वाभाविक है। सामने से देखने पर जरूर ऐसा लगता है की यह मुद्दा एक समुदाय विशेष के नेता द्वारा उस समुदाय के प्रति अपनी चिंता जाहिर करना है। पर राजनीति में कोई भी मुद्दा यूं ही नहीं उठाया जाता। उसके पीछे फायदे और नुकसान का पूरा गणित लगा होता है। उत्तर प्रदेश 1990 से ही जाती केंद्रित राजनीति का केंद्र रहा है।प्रदेश में ओबीसी वोटरों की आबादी 40% से ज्यादा है। राज्य के करीब 200 विधानसभा और 40 लोकसभा सीटों पर पर ओबीसी वोटर का प्रभाव रहता है। 2014 से हुए सभी चुनावों में भाजपा ने यादव वोट को छोड़ कर बाकी सभी ओबीसी वोट बैंक जिसमे अन्य कई जातियां शामिल हैं, में सेंध लगाई है। यही नहीं मायावती के दलित वोटर को भी भाजपा ने अपनी तरफ खींचा है। इसलिए रामचरितमानस विवाद पर दोनों दल सपा और भाजपा के नेता जाती और धर्म के नाम पर अपने कोर वोटरों को सेंधने में लग गए हैं।

भाजपा की ‘हम सब हिंदू एक हैं’ वाली राजनीति के मायने

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जब संत शिरोमणि रोहिदास की 647 जयंती समारोह में सभी जातियों के एक सामान होने की बात कहते हैं तो इसे बस एक कार्यक्रम भर से जोड़कर सीमित दृष्टिकोण से देखना गलत है। और न ही इसे मीडिया में कट्टर दक्षिणपंथी छवि से बाहर निकलने की कोशिश की तरह देखा जाना चाहिए। संघ प्रमुख के इस बयान के पीछे ‘संयुक्त हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना है। संघ और भारतीय जनता पार्टी हिंदू एकता और सनातन धर्म की  महत्वता सत्ता में बने रहने के लिए कितनी जरुरी है इसे समझते हैं। 2014 से ही भाजपा धर्म के नाम पर चुनाव में ध्रुवीकरण की कोशिश करती आई है और इसका सकारात्मक परिणाम उन्हें जीत के रूप में मिला है। साथ ही हमने पिछले चुनावों में देखा है की जब भी चुनाव राज्य के मुद्दे और जातीय विभाजन पर केंद्रित रहे है तो पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा है – राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़ चुनाव इसके उदहारण हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि बिहार में भी भाजपा रामचरितमानस की पंक्तियों को लेकर उठे विवाद को सनातन हिन्दू धर्म बनाम जाति की राजनीति में ध्रुवीकरण करके 2024 आम चुनाव में जीत पक्की करने की तैयारी कर रही है।

सपा की ओबीसी-अतिपिछड़े-दलित वोट बैंक को साधने की कोशिस

2014 से पहले तक उत्तर प्रदेश की राजनीति यादव, मुस्लिम बनाम अन्य सभी जातियों की थी। लेकिन भाजपा के ‘हिंदुत्व’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे ने सपा और बसपा की जातिगत ट्यूनिंग को बिगाड़ दिया है। अखिलेश यादव ये बात समझ गए हैं की अब सिर्फ मुस्लिम-यादव के दम पर सरकार में नहीं आया जा सकता है।  ऐसे में पार्टी को अन्य वोट बैंक को अपने साथ जड़ने की जरुरत है। स्वामी प्रसाद मौर्या को आगे रख कर और बिहार में उठे रामचरितमानस विवाद को प्रदेश में मुद्दा बना कर अखिलेश यादव नई सोशल इंजीनियरिंग की कोशिश कर रहे हैं। सपा मौर्या के नाम पर दलित चेहरे को पार्टी में जगह देकर अपनी नई रणनीति के तहत एम-वाई समीकरण के साथ अतिपिछड़े और दलित वोट बैंक को साधना चाह रही है। यही वजह है की  अखिलेश यादव ने सपा संगठन में 83 फीसदी दलित-ओबीसी और अल्पसंख्यकों को जगह दी है तो 17 फीसदी सवर्ण समुदाय के नेताओं को भी शामिल किया है। 2024 से पहले सपा अपनी ‘मुस्लिम-यादव’ वाली पार्टी की छवि से बाहर निकलना चाह रही है।

मायावती से छिटकते दलित वोट पर सपा-भाजपा की नज़र

बसपा का सियासी आधार देश भर में घटा है लेकिन उत्तर प्रदेश में स्थिति और भी गंभीर है। 2012 में जहाँ पार्टी  वोटबैंक करीब 26 फीसदी था वो आज 12.7 फीसदी रह गया है। यूपी में चुनाव दर चुनाव बसपा का सियासी आधार कमजोर हो रहा है।  यह सारा वोट बैंक मायावती से उदासीन होकर भाजपा की तरफ गया है। अखिलेश यादव ने बसपा से छिटके वोट बैंक को अपने खेमे में लाने के लिए ही दलित नेता त्रिभुवन दत्त को राष्ट्रीय सचिव बनाया है तो वहीं स्वामी प्रसाद मौर्या को खुल कर दलित और पिछड़े वर्ग के मुद्दों को उठाने के लिए खुली छूट दी गयी है। तो वहीँ भाजपा  सवर्ण+ओबीसी+दलित वोट बैंक के सहारे 50 फीसदी वोट शेयर के आंकड़े को पार करने की कोशिश करती दिख रही है। दोनों पार्टियां अपने – अपने तरीके से जातिगत सांठ-गाँठ बिठाने में जुडी हैं, किसका फार्मूला हिट होता है ये देखना दिलचस्प रहेगा।

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